आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने जायसी को तुलसी एवं सूर के साथ अपनी त्रिवेणी में स्थान दिया है। अपने तमाम पूर्वाग्रहों के बावज़ूद शुक्लजी जायसी को अगर तुलसी एवं सूर के समकक्ष रखते हैं तो इसका कारण जायसी की कृति 'पद्मावत'है। 'पद्मावत' ने शुक्लजी को इतना अधिक प्रभावित किया कि उन्होंने न सिर्फ़ जायसी ग्रंथावाली का संपादन किया, बल्कि इसकी लंबी भूमिका में जायसी की तारीफ़ के पुल भी बाँधे।
आचार्य शुक्ल से लेकर विजयदेव नारायण साही तक अनेक विद्वानों ने जायसी और 'पद्मावत' पर विचार किया और लगभग सभी ने नागमती के विरह वर्णन की विशेष चर्चा की है। आचार्य शुक्ल ने भी नागमती विरह को हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि घोषित करते हुये कहा है कि 'नागमती वियोग में अपना रानीपन भूल जाती है।''नागमती का विरह वर्णन जायसी की शक्ति है या कमज़ोरी?'यह सवाल हमारी एम ए की कक्षाओं के दौरान डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल ने उठाया था और इस पर एक संगोष्ठी पत्र लिखने को कहा था। आचार्य शुक्ल ने वियोग की अवस्था में नागमती के अपना रानीपन भूल जाने की तारीफ की थी।लेकिन डॉ अग्रवाल की दृष्टि में यह जायसी की कमज़ोरी थी कि उन्हें नागमती की वियोगावस्था को दर्शाने के लिये उसे रानी से सामान्य स्त्री के धरातल पर उतारना पड़ा। 'जायसी की महानता तो इस बात में होती कि नागमती के वियोग की पराकाष्ठा को उसके रानीपन के साथ विश्वसनीय बना पाते।'इस चुनौती ने हम सभी मित्रों को उद्वेलित कर दिया और अपने अपने तरीके से सभी इस वक्तव्य की चीरफाड़ करने में लग गये।कोई विरह वर्णन को जायसी की शक्ति सिद्ध करने में लगा था तो कोई इसकी कमज़ोरियों को अपना निशाना बना रहा था।इमानदारी से कहूँ तो मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था।थोड़ी थोड़ी दूर दोनों रास्तों पर बढ़ कर वापस लौट आया। घूमफिर कर मैं वापस शुक्ल जी के उसी कथन पर लौट आया, जो हमारा प्रस्थान बिन्दु था-'नागमती वियोग में अपना रानीपन भूल जाती है।''जितनी बार मैं नागमती वियोग खंड से होकर गुजरता, शुक्ल जी के इस कथन से सहमत होना मेरे लिये उतना ही मुश्क़िल हो जाता। जो स्त्री वियोग के मार्मिक एवं नितांत एकांत पलों में भी अपनी व्यथा को व्यक्त करने के लिये युद्ध के रूपकों का सहारा लेती हो,उसे साधारण स्त्री क्योंकर माना जाय?
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